ऋक्प्रातिशाख्य:

ऋक्प्रातिशाख्य:

- समानाक्षर, सन्ध्यक्षर, अघोष, सोष्म, स्वरभक्ति, यम, रक्त, संयोग, प्रगृह्य, रिफित

 

रचयिता - शौनक, पटल (अध्याय) (18) क्रमानुसार प्रथम कुछ अध्यायों के नाम 1. संज्ञा, 2. संहिता 3. स्वर 4. सन्धि 5 नति....।

यह 'ऋग्वेद' की 'शाकल' शाखा का प्रतिशाख्य है। इसे 'पार्षद' या 'पारिषद' मूत्र भी कहते हैं।

भाष्य

(1) उच्चट का भाष्य।

(2) विष्णुमित्र कृत (वृत्ति) ।

 

समानाक्षर

'अष्टो समानाक्षराण्यादित' (8) , , , , , , ,

 

सन्ध्यक्षर

'ततश्चत्वारि सन्ध्यक्षराणि' (4) , , , औ - -

 

अघोष

"जिह्वामूलीय उपध्मानीय अघोषसंज्ञका सन्ति ।” -

 

'अन्त्याः सप्त तेषामघोषा’ -(7) , , , जिह्वामूलीय फ्, , उपध्मानीय क्,

 

पुनश्च वर्गे प्रथमौ अघोषौ, अर्थात् क ख, च-छ, ट-ठ, त-थ, प-फ,

 

उपस्थापयन आह "अघोषे रेफ्यरेफी च

 

सोष्म

"युग्मौ सोष्माणौ" - वर्गे च द्वितीयचतुर्थो वर्णो सोष्माणौ। अर्थात् ख, , , , , , , , , भा

 

 

प्रयोजनम् आह- "सोष्मातु पूर्वेण सहोच्यते

 

स्वरभक्ति

 

उव्वट भाष्यानुसार स्वर भक्तिस्तु रेफेन लकारेण वा सम्बद्धा भवति" "स्वर भक्ति: पूर्वभागमक्षराणाम्।सा स्वरभक्तिः पूर्वं रेफं लकारं वा भजते। सा द्विविधा - -

 

1. दीर्घस्वरभक्ति:- अर्धमात्रा, (1/2)

2. हृस्वस्वरभक्तिः-अर्धोनमात्र उच्चारणकालः (1/4)

यम 

 

"स्पर्शा यमानुनासिकाः स्वान्परेषु” (कुँ खँ, मुँ, घुँ)

 

1. अघोषाल्पप्राणाः - कँ चँ रँ तँ पँ।

2. अघोषमहाप्राणाः - खँ छँ ठँ थँ फँ ।

3. सघोषाल्पप्राणाः - गँ जँ हँ दूँ बँ।

4. सघोषमहाप्राणाः - घँ झँ ढँ धँ भँ।

रक्त

स्पर्शसंज्ञोऽनुनासिकः” (,,ण्,,म्)

 

 

संयोग

द्वयोः व्यञ्जनवर्णयोः सन्निपातः । यथा- (प्र) प्रवस्त्रिष्टुभामिषम्। (संयोगस्तु व्यञ्जनसन्निपातः) ।

 

प्रगृह्य

सम्बोधनात्मकस्य पदस्य अन्ते विद्यमानस्य ओकारस्य आमन्त्रित ओकार प्रगृह्य संज्ञा" ।

 

रेफित

 

स्वर वर्ण के पूर्व में पञ्चम ऊष्म वर्ण (विसर्ग) हो तो वह रेफ़ित संज्ञक होता है। "उष्मोरेफी पञ्चमो नामिपूर्वः। यथा (अग्निरश्मिना जन्मना)

 

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